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अनोखा सच

आँखों से देखा और कानो से सुना हुआ भी "दिलकश" कभी धोखा होता है, जल्दबाजी मैं मत करो फैसला यूँही कई बार सच सोच से अनोखा होता है

किसी भी व्यक्ति को पूरी तरह से समजने के बाद ही उसके बारे मैं राय देनी चाहिए। एक छोटा सा किस्सा सुनाता हूँ - एक बार एक आदमी रस्ते मैं खड़े एक अंधे भिखारी की कटोरी मैं से कुछ पैसा निकाल लेता है। वहां खड़ा एक दूसरा आदमी ये देखता है और दौड़ के उसे पकड़ लेता है और बहोत पीटता है। बाद मैं पूछता है क्यों भाई एक अंधे की कटोरी मैं से पैसे चुराते हो तुम्हे शर्म नहीं आती। वो बोलता है माफ़ करना साहब पर तुम जिसे अँधा समज रहे हो वो अँधा नहीं है , कल मैं मजदूरी कर के शाम को मिले हुए पैसे गिन रहा था तो ये आकर उसे छीन के ले गया , मुझे पता था वो रोज यहाँ आके अंधे का नाटक करता है इसलिए मैंने आके मेरे पैसे वापस ले लिए फिर उस आदमी ने कहा तो कल ही उससे लड़के ले लेते ,तो वो बोला कल मैं लड़ता तो या तो वो मुझे मारता या मैं उसे और पुलिस केस हो जाता मुझे अस्पताल या फिर जेल मैं रहना पड़ता मेरा एक अपाहिज भाई है और एक ६ महीने की बेटी है उन दोनों की जिम्मेदारी है मुजपे फिर कोन उन्हें पालता इसलिए मैंने सोचा की उस वक्त मैं आके उससे पैसे ले लूंगा जब वो अंधे का नाटक करता है तो वो कुछ नहीं कर पायेगा और अपने बस बिना सोचे बिना कुछ पूछे मुझे पिट ही दिया अब तुम ही बताओ मैंने क्या गलत किया है... वो आदमी उसे देखता ही रहा उसे आज मालूम चला की जो आंखें देखती है वो ही सच नहीं होता।

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